सांप्रदायिकता
बहुलतावादी संस्कृति के विरुद्ध
दंगाइयों की कोई जाति या राष्ट्रीयता नहीं होती

परमानंद श्रीवास्तव

हटिंग्टन की भविष्यवाणी कि धर्मान्धता बढ़ेगी—इक्कीसवीं सदी में सच होती दिखती है। अभी तो इक्कीसवीं सदी की शुरुआत है—आगे जाने क्या हो। ‘महाजनी सभ्यता’ निबंध में प्रेमचंद ने लिखा था—‘धर्म की स्वतंत्रता का अर्थ अगर पुरोहितों, पादरियों, मुल्लाओं की मुफ्तखोर जमात के दंभमय उपदेशों और अंधविश्वास जनित रूढ़ियों का अनुसरण है तो निस्संदेह वहां इस स्वातंत्र्य का अभाव है, पर धर्म-स्वातंत्र्य का अर्थ यदि लोकसेवा, सहिष्णुता, समाज के लिए व्यक्ति का बलिदान, नेकनीयती, शरीर और मन की पवित्रता है, तो इस सभ्यता में धर्माचरण की जो स्वाधीनता है और किसी देश को उसके दर्शन भी नहीं हो सकते।’ अभी अभी मऊ में फैले सांप्रदायिक दंगों की खबरों के बीच एक यह भी है कि मुस्लिम बस्ती में चल रहे संस्कृत पाठशाला का भवन दंगाइयों ने क्षतिग्रस्त कर दिया। आश्चर्य नहीं कि वहां मुस्लिम छात्र भी प्रवेश लेते आ रहे हों। आखिर गुजरात में अहमदाबाद में ही मस्जिद में या मुस्लिम समाज की सम्मानित बस्ती में मुसलमान बच्चे संस्कृत में ही संवाद कर पा रहे हैं। यह हमारी बहुलतावादी संस्कृति का एक आदर्श उदाहरण है। दंगाइयों की कोई जाति या राष्ट्रीयता या संस्कृति नहीं होती। कभी हमारे शहर में महीनों जारी रहने वाले कर्फ्यू के बाद हमने छूट का फायदा लेकर मऊ में प्रगतिशील लेखक संघ का राज्य सम्मेलन बुलाया था। नामवर सिंह, काशीनाथ सिंह, पी.एन. सिंह, वीरेन्द्र यादव, विभूति नारायण राय जैसे अनेक लेखक-बुद्धिजीवी वहां इकट्ठा थे। नामवर सिंह ने मऊ को बुनकरों का शहर कहा था जहां फटे को भी सीने का चलन है। उधर संकीर्ण-धर्मांध ताकतें हैं जो फटे हुए में टांग अड़ा रही है।

खबर थी कि दंगा बलिया, बहराइच और गाजीपुर चला गया है। गाजीपुर राही मासूम रजा के गांव गंगोली के लिए जाना जाता है। वहां से ‘समकालीन सोच’ और ‘परिचय’ जैसी सेकुलर पत्रिकाएं निकलती हैं। वहां से कम्यूनिस्ट पार्टी के नामवर कार्यकर्ता निकले हैं। यह कैसा दंगा है जो भरत मिलाप और रोजे के संदर्भ में घटित हुआ। किस राजनेता के पास इस समस्या को सुलझाने-उलझाने की कुंजी है। कभी स्टूडेंट्स फेडरेशन जैसे छात्र संगठनों के लिए गाजीपुर जाना गया। हालत यह है कि फासीवादी ताकतें तो रास्ता जाम कर रही हैं और प्रदेश में राष्ट्रपति शासन की मांग कर रही है। किसी की दिलचस्पी भारतीय समाज में बहुसंख्यक अल्पसंख्यक राजनीति का व्याकरण समझने में नहीं है। बुकर सम्मानित लेखिका अरुंधती राय इसे फासीवाद और साम्राज्यवाद की मिली-जुली साजिश बताती हैं। अरुंधती राय के शब्द हैं—‘अतीत के खिलाफ खड़े होने से हमारे जख्म नहीं भरेंगे। इतिहास घट चुका है। यह खत्म हो गया है, जो हम कर सकते हैं वह यह कि इसकी दिशा बदल सकते हैं।’ (न्याय का गणित-32 पृष्ठ)

पीएसी के सांप्रदायिक उन्माद का दस्तावेज कथाकार विभूति नारायण राय लिख चुके हैं। जहां भाजपा सत्ता में थी, दंगे वहीं हुए। बाबरी मस्जिद ध्वंस के समय भी उत्तर प्रदेश में भाजपा सत्ता में थी। नरसिंह राव के हिंदू होने और आस्तिक होने का फायदा उठा लिया। मऊ में हत्यारे अब भी चुप न बैठे होंगे पर सपा का शासन है, खुद अल्पसंख्यक (मुसलमान) सपा के साथ हैं इसलिए स्थिति सुधर सकती है। गांव-गांव में रथ यात्रा, खड़ाऊं पूजन चलाकर भाजपा ने सांप्रदायिकता को विस्तार दे दिया है। मुस्लिम समाज में स्त्रियां पीड़ित हैं, भद्र वर्ग को कुलीनता कमरे में बंद रखती है। बेरोजगार नौजवान ही आगजनी, लूटपाट में शामिल हैं। उन्हें कुरान की आयतें क्यों याद आएंगी। याद आएगा तो यह कुपाठ कि औरतें मर्दों की खेती हैं। वे काटे या बोएं या बंजर रहने दें, क्या फर्क पड़ता है। प्रजनन को यों भी कृषि संस्कृति का रूपक मान लिया गया है। सुभाषिनी अली भी ऐसा ही मानती हैं। हिंदुत्व का कार्ड शहरी कुलीनों के पास है।

यह कैसा समाज है जिसे आम आदमी की समस्याएं नहीं छूतीं। न महंगाई, न बिजली संकट, न सूखा, न चुनावी हिंसा। इसे केवल भरतमिलाप, दशहरा, दीवाली, ईद खटकते हैं। वे पर्व या त्योहार खटकते हैं जिनमें जनता मेले की सी खुशी मानती है। दुर्गा पूजा या काली पूजा, मुहर्रम, ईद में कोई भेदभाव नहीं है। उन्हीं प्रतिमाओं के विसर्जन के समय पथराव हो जाता है, दंगा फैल जाता है। स्त्रियां दुर्गा को क्या कन्या की तरह विदा नहीं करतीं। आंसू बहुत-बहुत बेचैन नहीं कर रहे होते हैं। विजयोन्माद का शोर धीमा पड़ जाता है। मां के घर आने की प्रतीक्षा साल भर के लिए टल जाती है। लोग भूल गये हैं कि राजनीति का भी कोई धर्म हो सकता है। मऊ के दंगे को सर्वेक्षणों में वीभत्सतम बताया जा रहा है।

प्रेमचंद के जन्म के सवा सौ साल पूरे हो रहे हैं। उन्होंने कहा था—‘फिर हमारी समझ में नहीं आता कि वह कौन-सी संस्कृति है जिसकी रक्षा के लिए सांप्रदायिकता इतना जोर मार रही है। वास्तव में संस्कृति की पुकार केवल ढोंग है, निरा पाखंड और इसके जन्मदाता भी वही लोग हैं जो सांप्रदायिकता की शीतल छाया में बैठे विहार करते हैं।’ यही ‘शीतल छाया’ दंगाइयों के चलते आग की लपटों में बदल जाती है। न हिंदू सुरक्षित अनुभव करता है न मुसलमान। ‘ईदगाह’ सांस्कृतिक एकता की कहानी है। इस तरह की व्याख्या के लिए हमें नजरिया बदलना पड़ेगा। मेले में हिंदू-मुसलमान बच्चे साथ हैं। हामिद उनके लिए नायक हो जाता है—चिमटा सुंदरतम खिलौना जान पड़ता है। हामिद का चिमटा ही सुघड़ दर्शनीय कलाकृति हो जाता है। यही है दूसरा सौंदर्यशास्त्र जिसमें उपयोगिता भी कलात्मकता से होड़ लेती है। अरुंधती राय ने गुजरात को वह तश्तरी बताया जिसमें फासीवाद परसा जा रहा है।

अंत में याद करें पाकिस्तानी शायर जीशान साहिल की नज्म — पाकिस्तान : जो एक छोटा-सा मुल्क है/जिसके झंडे को देख के/हमें अपना मुल्क याद आने लगता है (जो शायद कहीं नहीं है)। यही समय है कि जब उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक दंगे जैसी घटनाएं हो रही हैं, भारत सरकार एक से अधिक बार पाकिस्तान के भूकंप पीड़ितों के लिए राहत सामग्री भेज रही है। दंगाइयों के क्षुद्र विध्वंसक मुहल्लों में क्या इस वैश्विक भूकंप त्रासदी का पता है।

डॉ. खुर्शीद अनवर
माँ और धरती माँ
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