दिल्ली इस शहर का नाम है, कोई भी नाम हो सकता है’, सचमुच नाम में क्या रखा है? क्योंकि केवल हमारा मुल्क नहीं पूरे दक्षिण एशिया के हर शहर की तस्वीर यही है। शहर जागते हैं तबाही फैलाने के लिए, शहर सोते हैं इसलिए कि तबाही पर नजर न जाए। हम सब उसी शहर का हिस्सा हैं। हममें से हर कोई किसी न किसी तरफ खड़ा है या सोने वालों में शामिल है या जागने वालों में। हम आप जैसे जागरूक लोग दरअसल सोने वालों की फेहरिस्त में हैं। हम सोते हैं कि तबाही पर हमारी नजर न जाए। हम जागते तब हैं जब ये तबाही हमारी तरफ बढ़ती है। इसी शहर में एक बड़ा तबका वो भी है जो न जागता है न सोता है। वो जागता इसलिए नहीं कि ना वो किसी को तबाह करने की ताकत रखता है और ना ही उसकी ऐसी मंशा है। और वो सोता इसलिए नहीं कि भूख, बीमारी और सरदी-गरमी-बरसात में खुले आकाश की छत उसे सोने का मौका ही नहीं देती। वो हमारे सरोकार में है। लेकिन कागजों पर...
Relevance of our existence
ISD took shape because during past five years the country witnessed a series of violent conflicts. They became a routine affair. Thousands of men, women and children fell victim to this madness. As Neruda says :
इंस्टीट्यूट फॉर सोशल डेमोक्रेसी (आईएसडी) द्वारा साझी विरासत पर आयोजिन होने वाली कार्यशालाओं की कड़ी में एक और कार्यशाला 20-25 मई, 2010 के दौरान इलाहाबाद में आयोजित की गई। कार्यशाला में चार राज्यों उड़ीसा, झारखंड, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश से 19 प्रतिभागियों ने भाग लिया। जिनमें से ज्यादातर प्रतिभागी सामाजिक संगठनों से जुड़े हैं और कुछ स्कूलों में पढ़ाने का कार्य करते हैं। कार्यशाला की शुरुआत 20 मई को दोपहर 12 बजे से हुई।